दोस्तों जीवन मे काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है। यदि इंसान चाहे तो छोटे काम को भी इतना बड़ा बना सकता है की दुनिया उनकी तारीफ करते ना थके। आज इस बात को बिहार के रहने वाले एक शख्स ने साबित कर दिखाया है। जी हाँ हम बात कर रहे हें “जय प्रकाश चौधरी Jay Prakash Chaudhary” की, जिन्होने एक सफल व्यक्ति बनने के लिए अपनी ज़िंदगी मे कड़ा संघर्ष करते हुए “सफाई सेना” के नाम से अपनी संस्था बनाई और साथ ही आज हजारो परिवारों को रोजगार दिया।

Jay prakash became a Millionaire in Scrap Business.

तो चलिए बात करते जय प्रकाश चौधरी Jay Prakash Chaudhary की कि कैसे उन्होने अपने जीवन मे कई कठिनाइयो का हिम्मत के साथ सामना करते हुए आज वे दिल्ली मे लगभग 4000 परिवारों को रोजगार देकर उनकी ज़िंदगी को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे है। Jay prakash became a Millionaire in Scrap Business.

Jay prakash chaudhary Scrap Business

पारिवारिक स्थिति

जय प्रकाश बताते हैं कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता बल्कि इंसान की सोच छोटी या बड़ी होती है। बिहार के मुंगेर जिले के रहने वाले जय प्रकाश चौधरी का जन्म 18 मार्च सन 1976 मे गांव के जमींदार परिवार में हुआ। वे अपने 9 भाई-बहनों के बीच में सबसे बड़े हैं जिसमे उनके 4 भाई और 5 बहनें हैं। जय प्रकाश के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने की वजह से उन्होंने प्राम्भिक शिक्षा अपने गांव के एक सरकारी स्कूल से ही की थी। उन्होने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सही करने के लिए अपने घर से शहर की तरफ काम की तलाश मे रूख किया।

जीवन का लक्ष्य।

उनका मन शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में नहीं लगता था जिस वजह से जैसे-तैसे उन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की और 17 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपना गांव छोड़कर काम की तलाश मे दिल्ली जाने के लिए विचार कर लिया। उस समय उनके जीवन का केवल एक ही लक्ष्य था और वो था केवल पैसा कमाकर अपने घर की आर्थिक स्थिति को बेहतर करके अपने परिवार को खुशहाल बनाना। जिसके लिए सन 1994 में उन्होंने अपना गांव छोड़कर दिल्ली शहर की तरफ प्रस्थान किया।

कचरा बीनने का काम किया

जैसा कि कोई भी नया व्यक्ति जब शहर की तरफ आता है तो उस शख्स को शहर के बारे में कुछ भी पता न होने की वजह से बहुत सी कठिनाइयों और मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, ऐसा ही कुछ जय प्रकाश के साथ भी हुआ। जब वे दिल्ली में आये तो उन्होंने अपने गांव के ही परिचित व्यकित की कनॉट प्लेस मे काफी दिनों तक खोजबीन की क्योकि वह दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक कपड़े की दुकान में काम करता था, परन्तु उनकी यह खोजबीन असफल रही और अपने परिचित की खोजबीन करते करते उनके लगभग सभी रूपये खत्म हो गए थे।

अब उनके पास खाने-पीने के लिए बिल्कुल भी रुपये नहीं बचे थे जिसकी वजह से उन्हें कभी मंदिर में तो कभी फुटपाथ में रात बितानी पड़ती थी। जय प्रकाश बताते हैं कि अंत में वे अपने परिचित की खोज करने में कामयाब हो गए, जो उस वक्त गोल मार्केट के राजा बाज़ार में स्थित एक कबाड़ वाली दुकान में काम कर रहे थे। परिचित व्यकित ने जब जय प्रकाश की परेशानी को समझा तो उन्हे कबाड़ की दुकान के लिए कचरा बीनने का काम करने के लिए कहा परन्तु उनका मन तो किसी अच्छी कपड़े की दुकान में काम करने का था, इसके बावजूद भी उन्होंने कुछ समय तक कचरा बीनने का काम किया और साथ ही साथ उन्होंने कनॉट प्लेस में नौकरी के लिए कई छोटी-बड़ी कपड़ों की दुकानों में गए परन्तु उन्हें सभी जगह से असफलता ही मिल रही थी।

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मजबूरी में सीखा मेहंदी लगाने का काम

ऐसे हालातो के बावजूद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और वापस आकर कनॉट प्लेस के पास ही बने एक हनुमान मंदिर में बैठ गए जहां पर उनकी मुलाकात महेंद्र और उनकी पत्नी रजनी से हुई जो वहीं पास में मेहंदी लगाने का काम करते थे। तब जय प्रकाश ने उनसे कोई काम के बारे में पूछा तो मेहंदी वाले शख्स ने बताया कि यदि आप मेहंदी लगाने का काम करें तो आप इससे आसानी से बहुत पैसे कमा सकते हो। उन्होंने डेढ़ महीने तक फ्री में मेहंदी सीखते हुए लगाने का काम भी किया। लेकिन इस काम को सीखने के दौरान उन्हें 2 वक्त का भोजन जरूर मिल जाता था। कुछ समय पश्चात उन्होंने कनॉट प्लेस में स्थित एक फ्रूट्स की दुकान में प्रातः 9:00 बजे लेकर रात्रि के 9:00 बजे तक काम किया जिसमे उन्हें केवल दिन के 20/- रूपये ही मिलते थे जो की उनके लिए ही पर्याप्त नहीं थे। इसके लिए उन्होंने फ्रूट्स की दुकान में आने वाले लोगों से काम के बारे पता लगाना शुरू कर दिया। कुछ समय के पश्चात ही उन्हें कनॉट प्लेस के पालिका बाजार में रात 12 से लेकर प्रातः 4:00 बजे तक साफ़-सफाई, ठेला और रेहड़ियों को इधर-उधर करने का काम मिल गया।

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अपनी कमाई से खरीदा टेलीविज़न

उन्होंने कुछ महीने तक रात 12 से लेकर प्रातः 4:00 बजे तक इसी तरह मजदूरी का काम किया और उनकी कमाई लगभग 150 रूपये तक हो जाती थी। जय प्रकाश बताते हैं कि कुछ महीने बाद उन्होंने अपनी पहली कमाई से सबसे पहले एक टेलीविज़न (T.V.) खरीदकर अपने घर ले गए। जय प्रकाश ने एक साक्षात्कार के दौरान बताया कि उनके गांव में केवल कुछ ही लोगों के पास TV होती थी और जिनके यहां TV नहीं होती थी, वे दूसरों के घर में देखने के लिए चले जाया करते थे। उन्ही परिवारों में से उनका परिवार भी शामिल था जो अन्य लोगों की तरह TV देखने के लिए दूसरे के घरो में जाते थे जिसके लिए उन्हें व् उनके परिवार वालों को कड़वी बातें सुननी पड़ती थी और कभी-कभी उन्हें व् उनके परिवार वालों को TV देखने से मना कर दिया जाता था, तब जय प्रकाश ने अपने मन में विचार कर लिया कि अब वे अपनी पहली कमाई से TV खरीदकर अपने परिवार के साथ बैठकर देखेंगे।

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कचरे का किया काम।

गांव में अपने परिवार के साथ कुछ समय बिताने के बाद Jay prakash वापस दिल्ली आ गए उनकी पुरानी नौकरी भी छूट गई थी आखिर थक कर उन्होने कचरा बीनने के काम को शुरू किया। सन 1995 में उन्होंने सबसे पहले 750/- रूपये की एक साईकिल खरीदी जिस पर कुछ महीनों तक लोगों के घरों में से कॉपी-किताब, अख़बार, गत्ते और कबाड़ सामानों को इकट्ठा करने के लिए गली-गली घूमते रहते थे। कुछ समय बाद उनका कचरा इकट्ठा करने का काम अच्छा चलने लगा और वे प्रतिदिन 150/- रूपये कमा लेते थे। अब उनके दिमाग मे खुद का कबाड़ का व्यवसाय Scrap Business करने की इच्छा हुई। अगले ही साल सन 1996 में उन्होंने राजा बाज़ार झुग्गी में एक सड़क के किनारे एक छोटा सा गोदाम किराये पर लिया जिसकी शुरुआत उन्होंने 10 अन्य कचरा बीनने वाले व्यक्तियों के साथ मिलकर की।

कौन-कौन सी समस्याओं का सामना किया।

अपने व्यवसाय मे हमेशा कुछ ना कुछ परेशानी आना तो आम बात है जल्द ही वहां स्थानीय पुलिस अक्सर उन्हें व् उनके साथ काम करने वाले व्यक्तियों को परेशान करने के लिए आने लगी और रुपयो  की मांग करती थी। रुपये न देने पर वहां की स्थानीय पुलिस उन्हें व् उनके साथ काम करने वाले व्यक्तियों को जेल में बंद कर देती थी और जेल में उनके साथ मार-पीट कर उनकी मेहनत के कमाए हुए रूपये निकलवा लेती थी। सन 1999 में जय प्रकाश जब एक चिंतन नाम के एक NGO के संस्थापक भारती चतुर्वेदी के संपर्क में आए, जो उस वक्त कूड़ेवालों पर अपना एक प्रोजेक्ट तैयार कर रही थी और उन्होंने ही जय प्रकाश को मानव के मूल अधिकार, कर्त्यव्य और भारत के सविंधान के बारे में समझाया। जय प्रकाश बताते हैं कि एक बार जब उनसे एक पुलिस वाले ने रुपयो की मांग की तो उन्होंने उस पुलिस वाले को धारा-14 और धारा-21 के बारे में बताकर रुपये देने से साफ मना कर दिया।

जीवन में आया टर्निंग पॉइंट।

समय की साथ साथ अपने कबाड़ की व्यापार को बढ़ाते हुए जय प्रकाश ने एक ऐसी मशीन खरीदी जिसमे कचरे को तुरंत रिसाइकिल भी किया जा सकता था। अब जय प्रकाश के व्यापार के अच्छे दिन आने लगे थे और साथ ही साथ उन्होने अपने काम के साथ कई और लोगो को भी जोड़ना शुरू कर दिया था। आज के समय में जय प्रकाश कबाड़ी गोदाम, राजा बाजार, कनॉट प्लेस और गोल्ड मार्किट जैसी जगहों से कचरे को इकट्ठा करके रिसाइकिल के लिए लेकर जाते है। सन 2009 में उन्होंने जे.पी. इंजीनियरिंग के नाम से अपनी एक कंपनी रजिस्टर्ड करवाई जिसमे करीब 12,000 से अधिक कबाड़ के गोदाम के मालिक, कबाड़  बीनने वाले व्यक्ति, सफाई कर्मचारी और रीसाइक्लिंग कंपनियां उनके साथ जुड़ कर काम को आगे बढ़ा रही हैं। जय के मुताबिक आज वे न केवल पैसे कमा रहे हैं बल्कि समाज, देश और पर्यावरण को भी सुरक्षित बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस काम के लिए दिल्ली सरकार ने जय प्रकाश को सम्मानित भी किया है।

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सफाई सेना” का किया गठन

सन 2008 में उन्होंने चिंतन नाम के एक NGO के संस्थापक भारती चतर्वेदी के साथ मिलकर उन्होंने “सफाई सेना” के नाम से एक संस्था का गठन किया जिसमे पिछले 11 वर्षों से उन्होंने अपने साथ काम करने वाले व्यक्तियों के साथ मिलकर प्रत्येक घर-घर में जाकर कूड़ा-कचरा और कबाड़ के सामान को लेकर इकट्ठा करने का काम कर रही है जिससे कि उस कूड़े-कचरे और कबाड़ को फिर से रीसायकल किया जा सके।

समाज के प्रति जय प्रकाश

आज जय न केवल अपनी कंपनी के जरिये पैसे कमा रहे हैं बल्कि वे अपनी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा भी देते हैं। जहां पहले वे अपने अधिकारों के लिए प्रति दिन लड़ते थे वहीं अब वे अन्य दूसरे मजदूरों के अधिकारों के लिए कार्य कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपने गांव में गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करते हुए कई स्कूल्स और कॉलेज भी बनवाये हैं।

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दोस्तों Jay prakash के मुताबिक समाज में लोग अपने अपने घरों का कूड़ा, कचरा और कबाड़ तो फैला देते हैं लेकिन उस कूड़े, कचरे और कबाड़ को साफ़ करने के लिए कोई भी व्यक्ति आगे नहीं आता, जिसके लिए उन्होंने अपनी कंपनी का गठन करके पूरी दिल्ली और गाज़ियाबाद में फैले हुए कूड़े, कचरे और कबाड़ का अब तक उन्होंने 20% यानि कि 62,133 Metric Tone रीसायकल कर चुकी है। आज उनकी Scrap Business के द्वारा कबाड़ को बेच कर 15 लाख रुपये महीने से अधिक की कमाई कर रहे है साथ ही वह लगभग 4,000 परिवार की ज़िंदगी को बेहतर करने का प्रयास कर रहे हैं। इस काम के लिए उन्हें समाज और सरकार की और से सम्मानित भी किया जा चूका है।


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