दोस्तों आज हम एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बात करेंगे जिन्होंने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। कैसे उन्होंने अपनी आज की जिंदगी को अपनी पुरानी जिंदगी के मुकाबले काफी बेहतर बना चुके हैं। हम बात कर रहे हैं चांद बिहारी अग्रवाल की जिन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए पहले पटना की सड़कों में कभी ठेला लगाकर पकौड़े बेचने का काम किया करते थे, तो कभी फुटपाथ पर साड़ियां बेचने का काम करते थे।

पटना की सड़कों में ठेला लगाकर पकौड़े बेचने वाला बना करोड़पति ज्वेलर्स।

how Become pakoda Seller chand bihari agrawal Millionaire Jewelers  आज वह पटना में जाने-माने गोल्ड ज्वेलरी शॉप के मालिक बने हुए हैं। इस शॉप का साल का टर्नओवर करीब 20 करोड रुपए से बढ़के है। हालांकि चांद बिहारी अग्रवाल को इस स्तर तक पहुंचने में काफी समय लग गया। इसके अलावा उन्होंने रोजगार को पैदा कर के सैकड़ो लोगों की जिंदगी को बदल दिया हैं, और भारत में बेरोजगारी की समस्या को कम करने का प्रयत्न भी किया है।

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गरीबी में बिता बचपन।

चांद बिहारी का जन्म जयपुर में हुआ था और वही पांच भाई बहनों के साथ ही उनकी परवरिश हुई थी। उनके पिताजी को एक बुरी आदत थी। वह रोज सट्टा खेलते थे। आज के दौर में भले ही सट्टा खेलना एक अपराध है परंतु उस समय सट्टा खेलना एक आम बात हुआ करती थी। शुरु शुरु में उनके पिताजी ने सट्टे के द्वारा बहुत पैसे बनाए परंतु उसके बाद उनकी किस्मत धीरे-धीरे खराब होने लगी और उनके पिताजी की घर संपत्ति सब सट्टे में लुट गई। उनके परिवार की स्थिति इतनी खराब हो गई कि चांद बिहारी को स्कूल छोड़ना पड़ गया। ऐसी हालत में उनकी मां नवल देवी जी ने अपने परिवार की जिम्मेदारी स्वयं अपने कंधे पर उठाई।

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रोड किनारे पकौड़े भी बेचे।

सन 1916 में 10 वर्ष की उम्र में चांद बिहारी अग्रवाल ने अपनी मां और भाई रतन के साथ मिलकर अपने परिवार के भरण पोषण के लिए भी ठेला लगाकर पकोड़े बेचने के काम करने लग गए। वह रोज 12 से 14 घंटे पकौड़े बेचने का काम करते और इस काम के बदले उन्हें 100 रुपये की कमाई होती थी। जिससे वह और उनका पूरा परिवार दो वक्त का खाना खाते थे।

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उनके दो छोटे भाई जैसे-तैसे स्कूल जाते थे और उनकी छोटी बहन घर पर ही साफ सफाई का काम करती थी। चांद बिहारी जी कहते है की छोटे भाइयो के साथ स्कूल जाने का उनका भी मन करता था पर माँ और भाई को पैसा कमाने में उनकी सहायता की जरुरत थी इसलिए उन्होंने स्कूल से मुँह मोड़ लिया। परन्तु उनको स्कूली शिक्षा मिली होती तो शायद वह अपनी जिंदगी में जल्दी सफल हो जाते परन्तु हालत उनके पक्ष में नहीं थे।

साड़ियों की दुकान में सेल्समैन के तौर पर भी रहे।

जयपुर में उन्होंने 12 वर्ष की उम्र में साड़ी की दुकान में 300 रुपये महीने की सेल्समेन के तौर पर नौकरी की। उस समय 300 रुपये काफी होते थे, 300 रुपये मैं उनके पूरे परिवार का भरण-पोषण हो जाता था।

भाई ने की मदद।

उनके बड़े भाई रतन की शादी सन 1972 में हुई। उनके बड़े भाई की शादी में मिले उपहार में 5000 रुपये से उनके बड़े भाई रतन ने जयपुर में ही 18 पीस चंदौसी साड़ियां 18 रुपये प्रति साड़ी के हिसाब से खरीदी, और वे साड़ियों को जयपुर से पटना ले आये। पटना में उनके द्वारा खरीदी गई चंदौसी साड़ियों के सैम्पल को दुकानदारों पर दिखाना शुरू कर दिया। जयपुरी चंदौसी साड़ियों को पटना के दुकानदार ने हाथो हाथ लिया। क्युकी उस समय पटना में जयपुरी साडिया बेचने वाले वह अकेले ही थे।

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इसके बाद तो रतन ने जयपुर जाकर वहां से चंदौसी साड़ियां खरीदते और वापस पटना लाकर बेचने का काम शुरू कर दिया। रतन की ससुराल पटना में ही थी।  जल्दी ही रतन का साड़ी का व्यवसाय अच्छा चलने लगा और इस साड़ी की वजह से उनको अच्छा फायदा होने लगा।

समय के साथ साथ उनका काम भी अच्छा चलने लगा। सन 1973 में रतन ने अपने छोटे भाई चाँद बिहारी को भी अपने साथ पटना बुला लिया। चाँद बिहारी जी के पास उस समय ज्यादा पैसे तो नहीं थे परन्तु उनके आगे बढ़ने के लिए हौसले बुलंद थे। जल्द ही पटना में एक किराये की दुकान के लिए तलाश शुरू कर दी परन्तु ज्यादा पैसे न होने की वजह से उन्होंने पटना रेलवे स्टेशन के पास ही फुटपाथ पर ही अपनी दुकान शुरू कर दी।

उस समय को याद करते हुए चाँद बिहारी जी कहते है की तपती गर्मी में वह पुरे दिन फुटपाथ से लोगो को आवाज लगा लगा के साडिया बेचा करते थे। वो समय उनके लिए काफी संघर्ष भरे दिन थे।

 

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मेहनत की सारी कमाई हुई चोरी।

पटना में उस समय जयपुरी साड़ियों का चलन उनके द्वारा ही चालू हुआ था। 25 प्रतिशत के मार्जिन रेट से सभी साड़ियों को बेच कर पुरे दिन भर में वह 200 से 250 रुपये तक कमा लेते थे। सभी दुकानदारों के दुकान दुकान चक्कर लगा लगा के उन्हें साड़िया दिखते थे और उनको बेचा करते थे।

इस तरह उनका माल भी बिक रहा था और सभी दुकानदारों से अच्छे व्यवहार भी बन रहे थे। धीरे धीरे उन्होंने अपना Retail Network खड़ा किया। एक साल बाद उन्होंने अपने व्यापार से रुपये बचा बचा कर खड़ा कुआ इलाके में एक दुकान किराये पर ली। किराये की दुकान से उन्हें अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली, और व्यापार में कई गुना तरक्की होने लगी।

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सन 1977 में जिस साल चाँद बिहारी जी की शादी हुई ठीक इसी साल अचानक एक दिन कुछ चोरों ने उनकी दुकान से साड़ियां और लगभग 4 लाख रुपए की नगदी सब कुछ लूट कर ले गए। 4 लाख रुपये की रकम उस ज़माने में बहुत हुआ करते थे। चाँद बिहारी जी का जमा जमाया हुआ व्यापर सब कुछ धराशाई हो गया। उनकी कुल जमा पूँजी अब उनके पास नहीं थी। उन्होंने जहा से शुरुवात की थी वह फिर वही आ गए थे। यह समय उनकी जिंदगी का सबसे बुरा दौर था।

उनके व्यवसाय में लगी पूंजी चोर लूट कर भाग गए। वे उस वक्त अपने आप को कमजोर असहाय टूटा हुआ महसूस करने लगे। इसके ठीक एक साल पहले ही चाँद बिहारी जी के बड़े भाई रतन ने भी साड़ियों का सारा काम बंद कर दिया था और वह रत्न और आभूषण के काम को करने लगे थे।

भाई ने फिर से की मदद।

चाँद बिहारी जी की परेशानियों का कोई हल नहीं निकल पा रहा था पैसों की तंगी से वह उस समय फिर से गुजरने लगे थे। कुछ समय बाद रतन ने चाँद बिहारी जी को सहारा देते हुए उन्हें रत्नों के काम में हाथ ज़माने को कहा, परन्तु उनके लिए यह विषय नया था। वह समझ नहीं पा रहे थे की वह क्या करे। ऐसे समय में उनके भाई रतन ने उनको समझाया और 50,000 रुपये से उनकी रत्न और आभूषण की दुकान की शुरुवात कराई। उन्होंने फिर से मेहनत और लगन से काम की शुरुवात की।

चाँद बिहारी जी बताते है की शुरुवाती दौर में वह शहर की ज्वेलर्स व अन्य दुकानदारों से सम्पर्क किया और जल्द ही करीबन 500 दुकानदारों को रत्नो को बेचा। रत्नो का व्यापार उनको फलने लगा था और 500 दुकानदारों को रत्न बेच कर लगभग 10 लाख रुपये जमा किये। इस रकम के द्वारा चांद बिहारी जी ने 2002 में 350 वर्गफुट की दुकान में चाँद बिहारी अग्रवाल ज्वैलरी हाउस की शुरुवात की। जल्द ही इसका सालाना टर्नओवर करोडो रुपये तक पहुंच गया।

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उत्तर प्रदेश और बिहार में भी व्यापार को फैलाया।

यह उनकी जिंदगी का सबसे अच्छा समय था और उनकी किस्मत से यह भी व्यवसाय अच्छा चल गया था। इसके बाद चांद बिहारी अग्रवाल जी अपने इसी काम में फोकस करने लगे और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। सन 1988 में इसी ज्वेलरी के व्यवसाय की सहायता से उन्होंने 10 लाख रुपए जमा किए और सोने के व्यवसाय में भी उतर गए। चांद बिहारी अग्रवाल ने यूपी और बिहार में अपने रत्नों की क्वालिटी और अपने विश्वास के आधार पर वहां भी अपना पैर जमा लिया। सन 2016 में ज्वेलरी के व्यवसाय से चांद बिहारी अग्रवाल ने अपने व्यापार का टर्नओवर 17 करोड़ रुपए कर दिया था।

उनकी शुरुवाती एक छोटी सी दुकान से शुरू कर, व्यापार को करोड़ों की टर्नओवर वाली कंपनी में तब्दील कर दिया है।  बता दें कि 2015 में उन्हें ऑल इंडिया बिज़नेस एंड कम्युनिटी फाउंडेशन के द्वारा सिंगापुर में सम्मानित किया गया था।

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कोई भी कार्य छोटा नहीं होता और एक छोटा सा किया हुआ कार्य कभी छोटा माना नहीं जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने दृढ़ निश्चय और साहस के साथ छोटे से काम की शुरुवात करें तो वह काम शून्य से बड़ा होकर करोड़ों रुपयों की कंपनी में तब्दील हो सकता है।

 


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